होलिकादहन  

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written by : ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन

on: 01-03-2018-10:13:24

गुरुवार को भद्रा के पश्चात्
होलिका विभूति धारण से मिलती है आरोग्य के साथ सुख-समृद्धि भी
धुरड्डी : 2 मार्च, शुक्रवार को

होली का पावन पर्व हर्ष, उमंग व उल्लास के साथ मनाने की परम्परा है। फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन होली का पावन पर्व मनाया जाता है। प्रख्यात ज्योतिषविद् श्री विमल जैन ने बताया कि इस बार पूर्णिमा तिथि 1 मार्च, गुरुवार को प्रातः 8 बजकर 58 मिनट पर लगेगी, जो कि उसी दिन अर्द्धरात्रि के पश्चात् भोर में 6 बजकर 21 मिनट तक रहेगी। स्नान-दान-व्रत की फाल्गुनी पूर्णिमा 1 मार्च, गुरुवार को रहेगी। पूर्णिमा तिथि की रात्रि में होलिकादहन करके का विधान है। भद्रा में होलिकादहन वर्जित है। भद्रा 1 मार्च, गुरुवार को प्रातः 8 बजकर 58 मिनट से रात्रि 7 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। भद्रा के पश्चात् शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाएगा। 22 फरवरी, गुरुवार से प्रारम्भ होलाष्टक आज 1 मार्च, गुरुवार को समाप्त हो जाएगा। चैत्र कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि 2 मार्च, शुक्रवार को सम्पूर्ण दिन रहेगी। इस दिन रंगोत्सव का रंगारंग पर्व एवं धुरड्डी विधि-विधानपूर्वक मनाया जाएगा। इसी दिन एक-दूसरे को लोग अबीर-गुलाल भी लगाएंगे। काशी में चौसट्टी घाट पर विराजमान चौसट्टी देवी का दर्शन करने की विशेष महिमा है। 

ऐसे करें होलिका पूजन-
प्रख्यात ज्योतिषविद् श्री विमल जैन ने बताया कि पूर्व स्थापित की गई होलिका की विधि-विधानपूर्वक पूजन की जाती है। होलिका पूजन में रोली, अक्षत, पुष्प, साबूत हल्दी गांठ, नारियल, बतासा, कच्चा सूत, गोबर के उपले एवं पूजन की अन्य सामग्री रहती है। होलिकादहन के समय होलिका की परिक्रमा करने का विधान है। होलिका की भस्म अत्यन्त ही चमत्कारिक मानी गई है। ऐसी मान्यता है कि होलिकादहन के पश्चात् होलिका की भस्म मस्तक पर लगाने से आरोग्य लाभ के साथ सुख-समृद्धि व खुशहाली में भी अभिवृद्धि होती है। फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही श्री चैतन्य महाप्रभु की जयंती मनाई जाती है। 

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