सादगी से जीता सबका दिल

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written by : सारथी

on: 20-02-2018-13:02:42

भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री अपनी सादगी के लिए कितने चर्चित थे ये बात तो सभी जानते हैं। सभी लोग उनकी सादगी को देखकर उनकी तरफ आकर्षित हो जाते थे और नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करते थे। आज हम आपको श्री लाल बहादुर शास्त्री की सादगी का एक ऐसा ही प्रसंग बताने जा रहे हैं जिसे पढ़कर आप भी उन्हें नतमस्तक करेंगे। दरअसल, बात उस समय की है जब लाल बहादुर शास्त्री जी एक अधिवेशन में शामिल होने के लिए भुवनेश्वर गए थे। अधिवेशन में जाने से पहले जब वह स्नान कर रहे थे, तो दयाल जी ने शास्त्री जी का सूटकेस खोलकर उनका कुर्ता निकाला। दयाल जी ने सोचा था कि शास्त्री जी को कपड़े ढूंढने में अधिक समय खराब ना हो इसीलिये वो ही उनका कुर्ता निकाल दें। 

जब दयाल जी ने उनके सूटकेस से कुर्ता निकाला तो देखा कि वह फटा हुआ है। उन्होंने ज्यों की त्यों उस कुर्ते की तह करके वापस सूटकेस में रख दिया और उसमें से दूसरा कुर्ता निकाला। दयाल ने देखा की शास्त्री का वह दूसरा कुर्ता भी कई जगहों से फटा हुआ है और कई जगहों से सिला भी हुआ है। उसके बाद दयाल शास्त्री जी का पूरा सूटकेस देखने लगे, वो ये देखकर चंकित रह गए कि उस सूटकेस में जितने भी कुर्ते रखे है वो सारे फटे हुए हैं। सभी फटे हुए कुर्तों को देखकर दयाल महोदय परेशान हो गए और सोचने लगे की अब अधिवेशन में शास्त्री जी क्या पहनकर जाएंगे। 

जब शास्त्री जी स्नान करके बाहर आए तो उन्होंने दयाल जी को परेशान देखा। शास्त्री जी ने उनसे सावल किया कि आप इतने परेशान क्यों हैं? तब दयाल जी ने उत्तर दिया कि मैं आपके पहनने के लिए कुर्ता निकाल रहा था, लेकिन मैंने देखा कि इसमें सारे कुर्ते फटे हुए हैं अब आप अधिवेशन में क्या पहनकर जाएंगे। तब लाल बहादुर शास्त्री जी ने बड़े ही सादगी से उन्हें समझाया कि इसमें चिंता करने वाली कोई बात नहीं है, अभी जाड़े का मौसम है और जाड़े में तो फटे-उधड़े कपड़े कोट के नीचे पहने जा सकते हैं। फिर, शास्त्री जी अधिवेशन में वहीं कपड़े पहनकर गए। 

अधिवेशन खत्म होने के बाद शास्त्री जी एक कपड़े के मिल का भ्रमण किया, उस मिल मालिक ने उन्हें कई खूबसूरत साड़ियां दिखाई। साड़ियों को देखते हुए शास्त्री जी ने मिल के मालकी से पूछा कि इन साड़ियों की कीमत क्या है? मिल मालिक ने उत्तर दिया कि जी, एक आठ सौ रुपये की है और एक हजार रुपये की है। इस पर शास्त्री जी ने कहा कि अरे भाई, ये तो बहुत महंगी है, मुझ जैसे गरीब के लायक ये साड़िया नहीं है मुझे कोई और साड़ी दिखाइये। 

तब मिल मालिक ने कहा- अरे सर, आप कैसी बातें कर रहे हैं? आप कहां गरीब है? आप तो देश के प्रधानमंत्री है और वैसे भी हम आपको ये साड़िया भेंट करने वाले हैं। तब शास्त्री जी ने कहा- नहीं भाई! मैं देश का प्रधानमंत्री अवश्य हूँ, किंतु गरीब हूँ, मेरा स्वाभिमान मुझे भेंट स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता। बस आप मुझे मेरी हैसियत के मुताबिक ऐसी साड़ियां दिखाइये जिन्हें मैं खरीद सकूं। लाल बहादुर शास्त्री के सादगी पूर्ण विचारों को सुनकर दयाल जी उनसे बहुत आकर्षित हुए और उनके समक्ष दयाल जी नतमस्तक हो गए।

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